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माटुंगा में सर्वश्रेष्ठ पुनर्गठन और दिवालियापन वकील

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मुफ़्त। 2 मिनट लगते हैं।

Kamaltara Partners LLP (Advocates & Solicitors)
मुंबई में कार्यालय, माटुंगा में सेवा, भारत
परामर्श ₹5,000 (15 मिनट)
प्रति घंटा शुल्क ₹20,000 – ₹30,000

2025 में स्थापित
उनकी टीम में 8 लोग
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Marathi (Marāṭhī)
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कमलतारा पार्टनर्स एलएलपी (KAMALTARA PARTNERS LLP) एक फुल-सर्विस लॉ फर्म है, जो व्यावसायिक और वित्तीय उद्यमों, बड़े कॉर्पोरेट...
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भारत पुनर्गठन और दिवालियापन वकीलों द्वारा उत्तरित कानूनी प्रश्न

हमारे 1 कानूनी प्रश्न ब्राउज़ करें पुनर्गठन और दिवालियापन के बारे में भारत में और वकीलों के उत्तर पढ़ें, या मुफ़्त में अपने प्रश्न पूछें.

क्या मेरा बैंक तीन चूकी हुई ईएमआई के लिए दिवालियापन/इंसॉल्वेंसी की कार्यवाही शुरू कर सकता है, जबकि मेरी कंपनी पुनर्गठन पर बातचीत कर रही है?
पुनर्गठन और दिवालियापन
मैं भारत में एक छोटा विनिर्माण यूनिट चलाता/चलाती हूँ और ग्राहक भुगतान में देरी के कारण तीन क़िस्तें चूक गयीं। हम कर्जदाताओं के साथ पुनर्गठन योजना पर बातचीत कर रहे हैं। बैंक अब क्या कदम उठा सकता है, और बातचीत जारी रहने के दौरान मैं व्यवसाय की रक्षा कैसे कर...
वकील का उत्तर Ishan Ganguly द्वारा

ऋणदाता द्वारा संभावित कार्रवाईयाँ ​भारतीय कानून के तहत, विशेषकर SARFAESI अधिनियम, 2002 के अनुसार, बैंकों के पास यदि ऋण सुनिश्चित (secured) हो तो प्रारंभिक न्यायालयीन हस्तक्षेप के बिना देनदारियाँ वसूल करने के पर्याप्त अधिकार होते हैं। ​धारा 13(2) नोटिस जारी...

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1 उत्तर •

भारत पुनर्गठन और दिवालियापन कानूनी लेख

हमारे 2 कानूनी लेख ब्राउज़ करें पुनर्गठन और दिवालियापन के बारे में भारत में व्यावहारिक कानूनी जानकारी के साथ.

भारत में कॉर्पोरेट दिवाला (IBC) प्रक्रिया - नियम और विकल्प
पुनर्गठन और दिवालियापन
मुख्य बातें (Key Takeaways) उद्देश्य: दिवाला और शोधन अक्षमता कोड (IBC) का मुख्य लक्ष्य कंपनी को बंद करना नहीं, बल्कि उसे बचाना है। समय-सीमा: कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को 330 दिनों के भीतर पूरा करना अनिवार्य है। निदेशकों की जिम्मेदारी: दिवालियापन के दौरान धोखाधड़ी या पक्षपातपूर्ण लेनदेन करने पर...
IBC बनाम ऋण पुनर्गठन - भारतीय व्यवसायों के कानूनी नियम
पुनर्गठन और दिवालियापन
मुख्य बिंदु (Key Takeaways) प्रबंधन का नियंत्रण: IBC (CIRP) शुरू होते ही कंपनी का प्रबंधन इनसॉल्वेंसी प्रोफेशनल (RP) के अधीन आ जाता है, जबकि RBI फ्रेमवर्क के तहत ऋण पुनर्गठन में मौजूदा प्रमोटर व्यवसाय का संचालन जारी रखते हैं। न्यूनतम डिफ़ॉल्ट सीमा: NCLT में IBC के तहत मामला दर्ज करने... और पढ़ें →

माटुंगा में कर्ज चुकाने में कठिनाई हो तो पहले कौन-सा कानूनी रास्ता देखें?

माटुंगा के कारोबारों में किराया, वेतन, आपूर्तिकर्ताओं का बकाया और बैंक ऋण साथ-साथ दबाव बना सकते हैं। कंपनी या सीमित दायित्व भागीदारी के मामले में दिवाला समाधान प्रक्रिया, ऋण पुनर्गठन, वसूली कार्रवाई का बचाव या समझौता अलग-अलग विकल्प हो सकते हैं।

माटुंगा में पता होने से मामला अपने आप किसी स्थानीय अदालत में नहीं जाता। कंपनी का पंजीकृत कार्यालय, ऋण का प्रकार और दावे की प्रकृति देखकर यह तय होता है कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की मुंबई पीठ या कोई अन्य सक्षम मंच उचित है।

माटुंगा में दिवाला और ऋण पुनर्गठन वकील की जरूरत किन स्थितियों में पड़ सकती है?

  • दादर-माटुंगा क्षेत्र के किसी छोटे या मध्यम कारोबार को बैंक ने ऋण चूक का नोटिस दिया हो या दिवाला प्रक्रिया शुरू करने की चेतावनी दी हो।
  • स्थानीय दुकान, भोजनालय या सेवा कारोबार किराया, वेतन और आपूर्तिकर्ताओं के बकाये के कारण भुगतान रोकने पर विचार कर रहा हो।
  • किसी कंपनी को परिचालन लेनदार से मांग-सूचना मिली हो और देनदारी या माल की गुणवत्ता पर वास्तविक विवाद हो।
  • किसी कंपनी के प्रवर्तक या निदेशक ने कंपनी के ऋण की व्यक्तिगत गारंटी दी हो और बैंक ने उनसे भुगतान मांगा हो।
  • लेनदारों के बीच भुगतान प्राथमिकता, गिरवी रखी संपत्ति या समाधान योजना पर मतभेद हो।
  • किसी व्यक्ति या साझेदारी फर्म को समझना हो कि उसके लिए कौन-सी दिवाला प्रक्रिया वास्तव में लागू है और कौन-सी अभी उपलब्ध नहीं है।

माटुंगा पर लागू प्रमुख दिवाला कानून और नियम

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 भारत में कंपनियों और सीमित दायित्व भागीदारी के दिवाला समाधान का मुख्य कानून है। 24 मार्च 2020 से कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया शुरू करने के लिए सामान्य न्यूनतम चूक राशि एक करोड़ रुपये की गई थी; आवेदन से पहले मौजूदा अधिसूचनाएं जांचना जरूरी है।

कंपनी अधिनियम, 2013 कंपनी के गठन, प्रबंधन और राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की भूमिका से जुड़े प्रावधान देता है। कंपनी के पंजीकृत कार्यालय और मामले के स्वरूप के अनुसार मुंबई पीठ का क्षेत्राधिकार तय हो सकता है।

भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड के कॉर्पोरेट व्यक्तियों के लिए दिवाला समाधान प्रक्रिया विनियम, 2016 आवेदन, दावों, सूचना और समाधान योजना की प्रक्रिया बताते हैं। ये विनियम 2016 में अधिसूचित हुए और बाद में उनमें संशोधन हुए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या कर्ज चुकाने में असमर्थता होते ही दिवालिया प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती है?

नहीं। बातचीत से पुनर्भुगतान का नया कार्यक्रम, ऋण पुनर्गठन या अन्य समाधान संभव हो सकता है। दिवाला आवेदन से पहले ऋण, चूक, उपलब्ध नकदी और संभावित परिणामों की कानूनी समीक्षा कराएं।

कंपनी के विरुद्ध दिवाला आवेदन कौन कर सकता है?

योग्य वित्तीय लेनदार, परिचालन लेनदार और कुछ स्थितियों में स्वयं कंपनी आवेदन कर सकती है। आवेदन की पात्रता, दस्तावेज और चूक की राशि कानून तथा लागू नियमों पर निर्भर करते हैं।

कॉर्पोरेट दिवाला प्रक्रिया के लिए न्यूनतम चूक कितनी होनी चाहिए?

सामान्यतः कंपनी के विरुद्ध आवेदन के लिए न्यूनतम चूक राशि एक करोड़ रुपये है। दाखिल करने से पहले नवीनतम सरकारी अधिसूचना और दावे की गणना वकील से जांचें।

परिचालन लेनदार को आवेदन से पहले क्या करना चाहिए?

आमतौर पर उसे कंपनी को मांग-सूचना या चालान की प्रति भेजनी होती है। यदि निर्धारित अवधि में वास्तविक पूर्व-मौजूद विवाद का प्रमाण सामने आए, तो दिवाला आवेदन स्वीकार होने पर असर पड़ सकता है।

क्या माटुंगा में रहने वाला व्यक्ति अपने व्यक्तिगत ऋणों के लिए दिवाला प्रक्रिया शुरू कर सकता है?

हर व्यक्ति के लिए एक समान प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है। व्यक्तिगत गारंटरों से जुड़ी कुछ दिवाला व्यवस्थाएं लागू हैं, लेकिन व्यक्तियों और साझेदारी फर्मों के लिए संहिता के सभी प्रावधान लागू नहीं हुए हैं।

कंपनी के ऋण की व्यक्तिगत गारंटी देने वाले पर क्या कार्रवाई हो सकती है?

लेनदार गारंटी की शर्तों के अनुसार गारंटर से भुगतान मांग सकता है और लागू कानून के तहत कार्यवाही शुरू कर सकता है। नोटिस, गारंटी दस्तावेज और कंपनी की दिवाला स्थिति की तुरंत अलग-अलग समीक्षा करानी चाहिए।

दिवाला आवेदन कहां दाखिल किया जाता है?

कंपनी से जुड़े मामलों में सक्षम राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के समक्ष आवेदन दाखिल होता है। माटुंगा का पता अकेले मंच तय नहीं करता; कंपनी का पंजीकृत कार्यालय और लागू क्षेत्राधिकार महत्वपूर्ण हैं।

कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया में कितना समय लग सकता है?

कानून में सामान्य अवधि 180 दिन है और निर्धारित शर्तों पर 90 दिन का विस्तार मिल सकता है। मुकदमेबाजी और अन्य कारणों से वास्तविक समय बढ़ सकता है; कानून में 330 दिन की बाहरी समय-सीमा भी दी गई है, कुछ न्यायिक अपवादों के अधीन।

दिवाला वकील की फीस कितनी होती है?

वकील की फीस के लिए कोई एक समान दर नहीं है। मामला, दस्तावेजों की संख्या, सुनवाई और अपील की संभावना के आधार पर लिखित शुल्क-प्रस्ताव और भुगतान चरण पहले तय करें।

क्या दिवाला प्रक्रिया और बैंक के साथ ऋण पुनर्गठन एक ही बात है?

नहीं। ऋण पुनर्गठन अक्सर लेनदार और कर्जदार के बीच भुगतान शर्तों में बदलाव होता है। दिवाला प्रक्रिया न्यायाधिकरण और कानून के तहत चलती है तथा उसके अपने समयबद्ध चरण और परिणाम होते हैं।

क्या एकल स्वामित्व वाले कारोबार पर कंपनी वाली दिवाला प्रक्रिया लागू होती है?

एकल स्वामित्व कारोबार कंपनी या सीमित दायित्व भागीदारी के समान कानूनी इकाई नहीं है। ऐसे मामले में मालिक की व्यक्तिगत देनदारी, ऋण के दस्तावेज और लागू व्यक्तिगत दिवाला प्रावधान देखकर रास्ता तय किया जाता है।

आधिकारिक जानकारी के लिए उपयोगी संस्थाएं

  • राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण: मुंबई पीठ की कार्यसूची, आदेश और कंपनी दिवाला मामलों की प्रक्रिया से जुड़ी आधिकारिक जानकारी देता है।
  • भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड: दिवाला नियमों, विनियमों और पंजीकृत दिवाला पेशेवरों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराता है।
  • कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय: कंपनियों के पंजीकरण और सार्वजनिक कंपनी अभिलेखों की जांच के लिए आधिकारिक सेवाएं देता है।

वकील खोजने और नियुक्त करने के अगले कदम

  1. पहले 1-2 दिनों में ऋण समझौते, गारंटी, मांग-सूचनाएं, बैंक विवरण और लेनदारों की सूची इकट्ठा करें।
  2. दो से तीन वकीलों से बात करें, जिनका कंपनी दिवाला, ऋण वसूली या न्यायाधिकरण में काम का प्रासंगिक अनुभव हो।
  3. पहली बैठक में पूछें कि आपके मामले में पुनर्गठन, समझौता, नोटिस का जवाब या दिवाला आवेदन में से कौन-सा विकल्प व्यावहारिक है।
  4. कंपनी का पंजीकृत कार्यालय, चूक की राशि और दावे के दस्तावेज जांचने के लिए वकील से स्पष्ट कार्य-योजना मांगें।
  5. फीस, अलग-अलग चरणों के भुगतान, संभावित अतिरिक्त खर्च और पेशेवर की जिम्मेदारियां लिखित रूप में तय करें।
  6. नियुक्ति से पहले वकील का बार काउंसिल पंजीकरण और हितों के टकराव की स्थिति जांचें; समय-सीमा वाला नोटिस हो तो उसी दिन प्राथमिक सलाह लें।

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