हरियाणा में सर्वश्रेष्ठ दिवालियापन वकील

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Oberoi Law Chambers
हरियाणा, भारत

2008 में स्थापित
उनकी टीम में 15 लोग
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फर्म की स्थापना वर्ष 2008 में “JUSTICE FOR ALL” के संकल्प के साथ की गई थी। ओबेरॉय लॉ चैंबर ट्रस्टेड एडवोकेट गगन ओबेरॉय द्वारा...
जैसा कि देखा गया

1. हरियाणा, भारत में दिवालियापन कानून के बारे में

भारत में दिवालियापन कानून मुख्य रूप से केंद्र सरकार के द्वारा शासित होता है। हरियाणा राज्य में भी सभी दिवालियापन कार्य IBC के अंतर्गत निकटतम न्यायपीठ और केंद्रीय नियमों से संचालित होते हैं। अदालत-आधारित समाधान में NCLT, NCLAT और IBBI की भूमिका अहम रहती है।

IBC 2016 का उद्देश्य तेज और उचित समाधान प्रदान करना है ताकि ऋणदाताओं और ऋणी के हित संतुलित रह सकें। यह corporate, individual और partnership फर्मों पर समान रूप से लागू होता है। साथ ही, SARFAESI और RDDBFI जैसे प्रचलित केंद्रीय कानून भी हरियाणा में ऋण-उद्धार प्रक्रियाओं के साथ सह-अस्तित्व रखते हैं।

“The Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 provides for time-bound resolution of insolvency and bankruptcy.”

Source: Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI)

“The Code seeks to consolidate and amend the laws relating to reorganization and insolvency.”

Source: Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI)

हरियाणा निवासी के लिए प्रमुख संबंधी बिंदु: यदि आप हरियाणा में व्यवसाय चलाते हैं और ऋण चुकाने में कठिनाई आ रही है, तब IBC के तहत CIRP या PIRP जैसी प्रक्रियाओं पर विचार किया जा सकता है। यह प्रक्रिया केंद्रीय न्यायाधिकरणों के माध्यम से नियंत्रित होती है, न कि किसी राज्य स्तर के अलग कानून से।

2. आपको वकील की आवश्यकता क्यों हो सकती है

दिवालियापन मामलों में सही वकील आपकी स्थिति के अनुसार मार्गदर्शन देता है। नीचे 4-6 वास्तविक परिदृश्य हैं जो हरियाणा से संबंधित हैं और जिनमें कानूनी सहायता आवश्यक हो सकती है:

  • हरियाणा-आधारित एक निजी लिमिटेड कंपनी दिवालिया हो रही है और बैंक ऋण बकाया है; CIRP शुरू करने और वैधानिक कदमों के लिए एक अनुभवी अधिवक्ता चाहिए।
  • एक एकल स्वामित्व व्यवसाय (sole proprietorship) मालिक ने अपने ऋण चुकाने में कठिनाई महसूस की है; व्यक्तिगत दिवालियापन या PIRP के उपायों पर सलाह आवश्यक है।
  • एमएसएमई जोड़ी के साथ उधारदाताओं के साथ पुनर्गठन या ऋण-समझौते के लिए हरियाणा-आधारित पेशेवर संस्था को निर्देशित करना हो;
  • केंद्रीय बैंकों द्वारा सुरक्षा हित के लिए SARFAESI के अंतर्गत कदम उठाने की आवश्यकता हो; DRT में भागीदारी के लिए वकील चाहिए;
  • पार्टनरशिप फर्म या कॉर्पोरेट डेब्टर के लिए स्टेकहोल्डर-क्रेडिटर कमेटी के गठन और CIRP प्रक्रियाओं में भागीदारी हो;
  • IBC के अंतर्गत व्यक्तिगत insolvency, आयकर-योजना और लाभ-आय-स्रोतों के मामले में PIRP प्रक्रिया शुरू करनी हो;

हरियाणा-आधारिक उदाहरण से आप समझ पाएंगे कि कौन सा मार्ग आपके केस के अनुरूप है। एक अनुभवी वकील/कानूनी सलाहकार/अधिवक्ता आपकी स्थिति के अनुसार सही प्रक्रिया चुनने में मदद करेगा।

3. स्थानीय कानून अवलोकन

हरियाणा में दिवालियापन नियंत्रित करने वाले प्रमुख केंद्रीय कानून ये हैं:

  • Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) - सभी प्रकार के दिवालियापन-सम्बंधी मामलों के लिए मुख्य केंद्रीय कानून।
  • Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Securities Interest Act, 2002 (SARFAESI Act) - secured debt recovery के लिए खास प्रावधान।
  • Recovery of Debts due to Banks and Financial Institutions Act, 1993 (RDDBFI Act) - डेब्ट-रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) के माध्यम से ऋण वसूली का तंत्र।

व्यावहारिक संदर्भ में हरियाणा में IBC के साथ-साथ इन केंद्रीय कानूनों के प्रावधान लागू होते हैं। यदि मामला कॉर्पोरेट प्रकृति का हो, तो NCLT/NCALT के समक्ष दायर किया जाता है।

4. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिवालियापन क्या है?

दिवालियापन वह स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति या संस्था की देनदारियाँ उसकी संपत्ति से अधिक हो जाती हैं और उसे debts-खर्चों का जिम्मेदार बनना पड़ता है। IBC इस स्थिति का समय-सीमा के भीतर समाधान प्रस्तुत करता है।

IBC हरियाणा में कैसे लागू होता है?

IBC केंद्रीय कानून है; हरियाणा में मामलों को NCLT के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। अदालतें समय-सीमा के भीतर समाधान कराने हेतु निर्देश देती हैं।

क्या IBC व्यक्तिगत दिवालियापन को कवर करता है?

हाँ, IBC व्यक्ति, sole proprietorship और partnership firms को भी कवर करता है, पर व्यक्तिगत insolvency के लिए PIRP/IIRP जैसी प्रक्रियाओं की जटिलताएँ अलग हो सकती हैं।

CIRP और PIRP में क्या अंतर है?

CIRP corporate debtors के लिए है, जिसमें एक insolvency professional का समन्वय होता है और creditors की समिति निर्णय लेती है। PIRP/IIRP व्यक्तिगत debtors के लिए है, जिसमें व्यक्तिगत ऋण-रेखा और ऋणदाताओं के साथ समाधान की योजना बनती है।

ICB के अंतर्गत कौन-कौन से पक्षकार होते हैं?

मुख्य पक्षकारों में corporate debtor (ऋणी कंपनी), financial creditors (बैंक/फाइनेंसर), operational creditors ( Suppliers) और insolvency professional शामिल होते हैं; NCLT/IBBI प्रक्रियाओं को संचालित करते हैं।

हरियाणा से जुड़े मामले के लिए फाइलिंग कहाँ करनी चाहिए?

आमतौर पर दायर करने के लिए NCLT के उसी बेंच के समक्ष जाना चाहिए जहाँ debtor का registered office या principal place of business स्थित है।

क्या दिवालियापन प्रक्रियाओं में स्टे मिल सकता है?

हाँ, CIRP/PIRP के दौरान कोर्ट-आदेश से स्टे लग सकता है ताकि तुरंत ऋण-चुकौती गतिविधियाँ नहीं चलें। स्टे का आवेदन अदालत द्वारा स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है।

कौन सा समय-सीमा निर्धारित है?

IBC में सामान्य तौर पर CIRP 180 दिनों के भीतर समाप्त करने की कोशिश की जाती है, जिसे 90 दिनों की एक्सटेन्शन के साथ बढ़ाया जा सकता है; PIRP/IIRP के लिए भी समय-सीमा निर्धारित होती है।

क्या मैं एक उच्च-स्तरीय पुनर्गठन योजना बनाई जा सकती है?

हाँ, CIRP के अंतर्गत creditor-committee के साथ reorganization or reconstruction की योजना बनाई जा सकती है; यह योजना NCLT द्वारा मंजूर होती है।

IBC के तहत भुगतान-फीस कैसे निर्धारित होती है?

IBBI के अंतर्गत insolvency professional, legal counsel और कोर्ट-फीस प्रावधानित दरों पर निर्भर होते हैं; शुल्क संरचना केस-टू-केस अलग हो सकती है।

क्या हरियाणा में मैं कानूनी सहायता मुफ्त ले सकता हूँ?

हाँ, हरियाणा स्टेट लॉ स्कूल्स अथवा HSLSA के माध्यम से निशुल्क या कम-शुल्क कानूनी सहायता मिल सकती है, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए।

दिवालियापन के दौरान मेरी संपत्ति सुरक्षित रहेगी?

IBC-प्रक्रिया के दौरान asset-protection और creditor-claims के अनुशासन होते हैं; insolvency professional संपत्ति-संरक्षण सहित प्रक्रिया चलाते हैं।

क्या विदेशी ऋण/क्रेडिट भी IBC के दायरे में आते हैं?

IBC में विदेशी ऋण भी शामिल हो सकते हैं यदि वे भारत में जकड़े debt obligations से जुड़े हों और debtors भारतीय कानून के अधीन आते हैं।

हरियाणा निवासी के लिए एक सरल कदम कौन-सा है?

पहले एक प्रशिक्षित वकील से परामर्श लें; सही प्रक्रिया (CIRP, PIRP, PPIRP आदि) का चयन करें; IBBI-registered insolvency professional की सहायता लें; संबंधित दस्तावेज़ तैयार रखें; संपूर्ण फाइलिंग और कोर्ट-सम्पर्क बनाएं।

5. अतिरिक्त संसाधन

  • Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - आधिकारिक नियामक और संसाधन. https://www.ibbi.gov.in
  • National Company Law Tribunal (NCLT) - दिवालियापन आदि मामलों की सुनवाई के लिए केंद्रीय न्यायाधिकरण. https://nclt.gov.in
  • Haryana State Legal Services Authority (HSLSA) - हरियाणा निवासियों के लिए निःशुल्क या कम-फीस कानूनी सहायता सेवाएं. https://hslsa.gov.in
  • National Legal Services Authority (NALSA) - भारत-भर के लिए कानूनी सहायता के संसाधन. https://nalsa.gov.in

6. अगले कदम

  1. अपनी स्थिति को स्पष्ट रूप से संक्षेप में लिखें: कंपनी, sole proprietorship या व्यक्ति-स्तर के ऋण आदि।
  2. IBBI के पंजीकृत Insolvency Professionals (IPs) की खोज करें और उनके अनुभव की जाँच करें.
  3. कौन-सी प्रक्रिया उपयुक्त है यह तय करें (CIRP, PIRP, PPIRP आदि) और प्रत्येक के पक्ष-प्रभाव समझें.
  4. अपने ऋणदाताओं के साथ तालमेल बनाएं; आवश्यक दस्तावेज़ एकत्र करें (बैंकरप्सी-प्लान, आय-प्रमाण आदि).
  5. एनसीएलटी/एनसीएलएटी में दायराबद्ध फाइलिंग के लिए अनुभवी वकील की सहायता लें; अदालत-पूर्व तयारी करें।
  6. कानूनी शुल्क, फीस संरचना और अनुमानित समय-रेखा पर स्पष्ट लिखित समझौता करें.
  7. समय-समय पर केस की स्थिति की समीक्षा करें और आवश्यकतानुसार रणनीति अपडेट करें.

यह गाइड हरियाणा, भारत निवासियों के लिए दिवालियापन कानून की एक स्पष्ट तस्वीर देता है। यदि आप प्रारम्भिक कदम उठाते हैं, तो केंद्रीय कानूनों की सही समझ और योग्य अधिवक्ता की सहायता से परिणाम बेहतर होते हैं।

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