कोलकाता में सर्वश्रेष्ठ दिवालियापन वकील

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कोलकाता, भारत

English
एसकेबी एसोसिएट्स भारत में एक प्रतिष्ठित लॉ फर्म है, जो अपने व्यापक कानूनी सेवाओं और ग्राहक सफलता के प्रति...
AUGUSTUS LAW
कोलकाता, भारत

2011 में स्थापित
English
ऑगस्टस लॉ, जिसकी स्थापना 2011 में हुई थी, मुंबई और कोलकाता में कार्यालयों वाला एक गतिशील विधिक फर्म है, जो भारत के...

English
लॉ चैंबर ऑफ़ मोहम्मद आमर ज़ाकी भारत में एक प्रतिष्ठित विधिक कंपनी के रूप में उभरी है, जो आपराधिक, तलाक, नागरिक,...
LAW CHAMBER OF ADVOCATE RAJVEER SINGH

LAW CHAMBER OF ADVOCATE RAJVEER SINGH

15 minutes मुफ़्त परामर्श
कोलकाता, भारत

2016 में स्थापित
उनकी टीम में 10 लोग
Hindi
English
Welcome to the Law Chamber of Advocate Rajveer Singh, Advocate Rajveer Singh is an Advocate and Registered Trademark Attorney with over 8 years of experience in Supreme Court of India, High Courts and District Courts. With a robust practice spanning multiple domains, we offer comprehensive...
JSG Legal
कोलकाता, भारत

2016 में स्थापित
English
जेएसजी लीगल, 2016 में स्थापित, भारत में एक प्रमुख पूर्ण-सेवा लॉ फर्म है, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों ग्राहकों की...
Fox & Mandal
कोलकाता, भारत

1896 में स्थापित
उनकी टीम में 200 लोग
Hindi
English
जॉन केऱ फॉक्स और गोखुल चंद्र मंडल द्वारा 1896 में स्थापित, फॉक्स एंड मंडल (एफ एंड एम) भारत के सबसे पुराने विधिक...
LEXMOTION
कोलकाता, भारत

English
भारत स्थित एक प्रतिष्ठित विधि फर्म, LEXMOTION, दिवालियापन सेवाओं, नागrik कानून और जिला अटॉर्नी प्रतिनिधित्व सहित विभिन्न...
जैसा कि देखा गया

1. कोलकाता, भारत में दिवालियापन कानून के बारे में: कोलकाता, भारत में दिवालियापन कानून का संक्षिप्त अवलोकन

भारत के मुख्य दिवालियापन कानून का ढांचा Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) है। यह केंद्र सरकार का कानून है और पूरे देश पर लागू होता है, जिसमें कोलकाता भी शामिल है।

कोलकाता में Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP) और Liquidation जैसे प्रक्रम NCLT, Kolkata Bench के माध्यम से संचालित होते हैं।

व्यक्तिगत दिवालियापन के लिए Insolvency Resolution Process (IRP) और Fresh Start जैसी प्रक्रियाएं भी प्रचलित हैं, ताकि व्यक्ति नए सिरे से पुनर्स्थापित हो सके।

“The Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 provides for a time bound resolution process for resolving insolvency of corporate persons, individuals and partnership firms.”

Source: Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - https://www.ibbi.gov.in

“NCLT Kolkata Bench adjudicates corporate insolvency petitions filed from West Bengal and surrounding regions.”

Source: National Company Law Tribunal - Kolkata Bench - https://nclt.gov.in

2. आपको वकील की आवश्यकता क्यों हो सकती है: 4-6 विशिष्ट परिदृश्य जिनमें कानूनी सहायता जरूरी होती है

  • कोलकाता-आधारि कंपनी पर CIRP शुरू हुआ हो: बैंकों या फाइनांशियल इन्स्टिट्यूशनों ने Kolkata आधारित कंपनी के विरुद्ध CIRP दायर किया हो। वकील आपकी रणनीति बना सकता है, आवश्यक दाखिले और RP/IP के साथ समन्वय कर सकता है।
  • व्यक्तिगत दिवालियापन के लिए IRP या Fresh Start चाहिये: आय और देनदारियों के साथ व्यक्तिगत IRP की प्रक्रिया शुरू करनी हो या Fresh Start के विकल्प पर विचार हो रहा हो।
  • मौजूदा क्रेडिटर-क्रेडिट रिस्पॉन्डर विवाद हो: क्रेडिटर्स के साथ पुनर्गठन, दायित्वों के मान्यता और ताबेदारी तय करने के लिए कानूनी सलाह आवश्यक हो।
  • Cross-border insolvency या विदेशी क्रेडिटर्स का मामला: विदेशीय ऋणों और क्रेडिटर्स के साथ Kolkata स्थित केस में समन्वय जरूरी हो।
  • कंपनी-यांत्रिक पुनर्गठन (Restructuring) की योजना बनानी हो: नए वित्तीय पुनर्गठन, DIP-ड्राइवरशिप आदि का प्रभावी प्लान बनाना हो।
  • कानूनी जोखिम, ड्यू डिलिजेंस और प्रक्रिया लागत का आकलन: केस की लागत, समयसीमा, और संभावित आउटपुट के बारे में स्पष्ट मार्गदर्शन चाहिए हो।

उद्धरण के साथ मार्गदर्शन: Kolkata के वकील IBC नियमों, क्लासीफिकेशन और प्रक्रिया के अनुरूप मार्गदर्शन देते हैं।

Source: IBBI और NCLT आधिकारिक पन्ने - https://www.ibbi.gov.in और https://nclt.gov.in

3. स्थानीय कानून अवलोकन: कोलकाता, भारत में दिवालियापन को नियंत्रित करने वाले 2-3 विशिष्ट कानून

  • Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) - केंद्र स्तर पर मुख्य कानून जो कॉर्पोरेट, व्यक्तिगत और साझेदारी दिवालियापन को एक ही ढांचे में संशोधित करता है।
  • Recovery of Debts Due to Banks and Financial Institutions Act, 1993 (RDDBFI Act) - बैंकों व वित्तीय संस्थानों के द्वारा दिए गए ऋणों की वसूली के लिए Debt Recovery Tribunals की स्थापना करता है।
  • Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002 (SARFAESI Act) - secured क्रेडिटर्स को संपत्ति पर सिक्योरिटी राइट्स के माध्यम से त्वरित वसूली के उपाय देता है।
  • Companies Act, 2013 (विंकिंग-अप संबंधी प्रावधान) - जब किसी कंपनी का दिवाला-प्रक्रिया IBC के अंतर्गत नहीं चलती हो, तब winding up आदि प्रावधान लागू हो सकते हैं; IBC के साथ इन दोनों कानूनों के बीच समन्वय आवश्यक होता है।

ये कानून कोलकाता में दिवालियापन मामलों के तात्कालिक प्रशासन, अदालतों और क्रेडिटर-डायरेक्शन के संबंध में केंद्रीय ढांचे का हिस्सा हैं।

“The IBC provides a consolidated framework for insolvency resolution across corporate and individual debtors.”

Source: IBBI - https://www.ibbi.gov.in

“RDDBFI Act and SARFAESI Act facilitate targeted recovery by banks and financial institutions.”

Source: RBI & MCA pages - https://www.rbi.org.in और https://www.mca.gov.in

4. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिवालियापन क्या है?

दिवालियापन वह स्थिति है जिसमें कोई व्यक्ति या संस्था अपनी देनदारियाँ पूरी तरह चुकाने में असमर्थ हो। IBC इस स्थिति में पुनर्गठन या परिसमापन के लिए एक समय-सीमित प्रक्रिया प्रदान करता है।

IBC क्या है?

IBC एक केंद्रीय कानून है जो कॉर्पोरेट, व्यक्तिगत और साझेदारी दिवालियापन के लिए एक सुव्यवस्थित ढांचा देता है। इसका उद्देश्य तेज़, पारदर्शी और निष्पक्ष समाधान प्रदान करना है।

कोलकाता में दिवालियापन केस कैसे शुरू होते हैं?

केस आम तौर पर NCLT, Kolkata Bench के समक्ष दायर होते हैं। CIRP के लिए क्रेडिटर केस दायर कर सकता है, और IRP/ RP नियुक्त होते हैं।

क्या मुझे वकील की आवश्यकता है?

हाँ, क्योंकि IBC के अनुसार कई चरण, फाइलिंग और स्पष्टीकरणों की जरूरत होती है। एक अनुभव-युक्त अधिवक्ता केस मैनेजमेंट में मदद करेगा।

CIRP के दौरान moratorium क्या है?

Moratorium से ऋण-खपत पर नए कार्यवाहिक कदम रोक दिए जाते हैं ताकि ऋणदाता नुकसान से बचे रहें। प्रभाव 180 दिनों तक रहता है, जिसे extender किया जा सकता है।

Fresh Start क्या है और कौन लाभ उठा सकता है?

Fresh Start एक व्यक्ति-स्तर का प्रावधान है ताकि छोटे ऋण के साथ शुरुआत की जा सके। यह प्रक्रिया debt discharge के साथ जुड़ी है और पात्रता नियम स्पष्ट करते हैं।

व्यक्तिगत बनाम कॉर्पोरेट दिवालियापन में क्या अंतर है?

कॉर्पोरेट में CIRP, RP और Adjudicating Authority का केंद्रीय नियंत्रण होता है। व्यक्तिगत में IRP, Fresh Start और व्यक्तिगत क्रेडिट-रेकों के नियम लागू होते हैं।

IP/ Insolvency Professional भूमिका क्या है?

IP CIRP/resource- management के लिए नियुक्त होता है और कंपनी के मौजूदा कार्यों, ऋण-समীকण और समाधान योजनाओं की निगरानी करता है।

कितना समय लगता है CIRP का पूरा होना?

IBC के अनुसार CIRP का लक्ष्य 270 दिनों के भीतर समाधान निकालना है, पर कई मामलों में यह बढ़ भी सकता है।

क्या मैं कोलकाता में कानून-फार्म चुनते समय स्थानीय कानून की मदद ले सकता हूँ?

हाँ, local अनुभव और NCLT Kolkata Bench के साथ अनुभव वाले advodate अधिक उपयोगी रहते हैं।

Cross-border Insolvency क्या चीज है?

Cross-border insolvency में विदेशी क्रेडिटर्स और विदेश-आकृति परिसरों के बीच समन्वय होता है। IBC इसमें भी मार्गदर्शन देता है।

दिवालियापन के समय लेनदार-उपाय क्या होते हैं?

कई मामलों में debt restructuring, asset sale और reorganization योजनाओं पर निर्णय होते हैं। कानूनी सलाह से उपयुक्त योजना बनती है।

5. अतिरिक्त संसाधन: दिवालियापन से संबंधित 3 विशिष्ट संगठन

  • Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - IBC के अनुरूप संस्थागत विनियमन और प्रोफेशनल्स की रजिस्ट्रेशन साइट: https://www.ibbi.gov.in
  • National Company Law Tribunal (NCLT) - कोलकाता बेंच सहित सभी बेंचों की जानकारी: https://nclt.gov.in
  • Reserve Bank of India (RBI) - बैंक और फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशनों की क्रेडिट-रेकोविरी मार्गदर्शक नीतियां: https://www.rbi.org.in

6. अगले कदम: दिवालियापन वकील खोजने के लिए 5-7 चरणीय प्रक्रिया

  1. अपने मामले के प्रकार स्पष्ट करें - कॉर्पोरेट CIRP, व्यक्तिगत IRP या अन्य क्षेत्र।
  2. कोलकाता में IBC विशेषज्ञता वाले वकीलों की सूची बनाएं - बार काउंसिल ऑफ़ वेस्ट बंगाल और प्रमुख लॉ फर्म देखें।
  3. पूर्व अनुभव और सफलता-परिस्थितियों की जांच करें - विशेषकर Kolkata Bench के साथ काम करने का रिकॉर्ड।
  4. कानूनी शुल्क संरचना और अनुमानित खर्च पूछें - फिक्स्ड फ़ी vs प्रोपोरश्नल मॉडल समझें।
  5. पहले परामर्श के दौरान केस-स्टडी, रणनीति और टाइमलाइन पर चर्चा करें।
  6. नीति-गाइडेड चेकलिस्ट बनाएं - दस्तावेज, देनदारियाँ, creditors, और debt-structure एक जगह रखें।
  7. एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर से पहले वार्ता और क्लॉज जाँच कराएं - conflict of interest, confidentiality आदि मानक पूछें।

सम्पूर्ण मार्गदर्शन के लिए आप West Bengal Bar Council के सदस्य-स्थापित अधिवक्ताओं से भी सलाह ले सकते हैं: https://wbbarcouncil.gov.in

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