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LAW CHAMBER OF ADVOCATE RAJVEER SINGH

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15 minutes मुफ़्त परामर्श
गया, भारत

2016 में स्थापित
उनकी टीम में 10 लोग
English
Hindi
Welcome to the Law Chamber of Advocate Rajveer Singh, Advocate Rajveer Singh is an Advocate and Registered Trademark Attorney with over 8 years of experience in Supreme Court of India, High Courts and District Courts. With a robust practice spanning multiple domains, we offer comprehensive...
जैसा कि देखा गया
गया, भारत में मानहानि कानून पर विस्तृत गाइड

गया, भारत में मानहानि कानून के बारे में

मानहानि कानून भारत के दो आयामों में संचालित होता है। पहला अपराधी मानहानि है, जो भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 499 से 502 तक में दण्डनीय है। दूसरा नागरिक मानहानि है, जिसे दीवानी अदालतों में निपटाया जाता है।

ऑनलाइन मंचों पर मानहानि भी अब सामान्य हो गई है। इंटरनेट पर गलत सूचना तेजी से फैल सकती है, जिससे प्रत्यक्ष या परोक्ष नुकसान होता है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने IT अधिनियम की धारा 66A को असंवैधानिक ठहराया, ताकि ऑनलाइन भाषण पर अनुचित दमन ना हो।

All citizens shall have the right to freedom of speech and expression. Article 19(1)(a) Constitution of India.

सार्वजनिक संहिता में भाषण की स्वतंत्रता सीमित है। पाठक, पाठन और प्रकाशन के बिना भी मानहानि से सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।

सार्वजनिक संल्ग्नन के कारण सरकार और अदालतें मानहानि के मामलों को संजीदगी से लेती हैं। सुरक्षा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संतुलन पर ध्यान दिया जाता है।

तुम्हें वकील की आवश्यकता क्यों हो सकती है

  • गया, बिहार के स्थानीय समाचार पत्र या सोशल मीडिया पोस्ट से उत्पन्न मानहानि के वास्तविक केस की तैयारी में एक अनुभवी advokat की जरूरत रहती है।
  • अगर आपके विरुद्ध IPC धारा 499-502 के अंतर्गत अपराधी मानहानि दर्ज है तो तुरंत कानूनी मार्गदर्शन आवश्यक है।
  • यदि आप विपरीत पक्ष के विरुद्ध civil defamation के दावे कर रहे हैं या कर रहे हैं, तो स्थानीय जूरी-टिप्पणी और प्रमाण-पत्र से जुड़ी जटिलताएं समझना जरूरी है।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मानहानि हुई हो तो IT अधिनियम और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड कानून के अनुप्रयोग की गहरी समझ जरूरी है।
  • अगर आप सार्वजनिक व्यक्ति हैं और मीडिया या जन-सम्पर्क के कारण आरोप झेल रहे हैं, तब अनुभवी वकील से स्पेशलाइज़ड सलाह लाभदायक रहती है।
  • स्थानीय गोपनीयता, प्रकाशित सामग्री की सत्यता और निष्कपट प्रतिवेदन के लिए मजबूत तर्क-संदेह बनाना वकील के साथ संभव होता है।

स्थानीय कानून अवलोकन

1) भारतीय दण्ड संहिता (IPC), 1860- मानहानि धारा 499 से 502 तक व मुआवजे के उपाय। जहां Imputation का उद्देश्य व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना हो, वहां मामला बनता है।

2) द एंडी विधिक प्रक्रियाओं का संहिता (CPC), 1908- नागरिक मानहानि के मामले दीवानी अदालतों में सुने जाते हैं; मुकदमे का संचालन और साक्ष्यों का परीक्षण CPC के तहत होता है।

3) सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000- ऑनलाइन मानहानि में उपयोगी होता है। 66A जैसी धाराओं की वैधता पर सुप्रीम Court ने 2015 में निर्णय दिया।

नोट: कायदा की स्थानीय प्रक्रिया के अनुसार गया, बिहार के लिए उच्च न्यायालय Patna है और मानहानि के मामले आम तौर पर गया जिला कोर्ट या पटना उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मानहानि क्या है?

मानहानि वह प्रयत्न है जिसमें किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला imputation प्रकाशित या प्रसारित किया जाए।

भारत में मानहानि दो प्रकार से क्यों बनती है?

क्रिमिनल मानहानि IPC धारा 499-502 के तहत होती है, जबकि नागरिक मानहानि दीवानी अदालत में दायर की जाती है।

क्या सच बताने से मानहानि का रक्षा संभव है?

हाँ, सत्य एक रक्षा हो सकता है, पर निर्भर है कि इम्प्यूटेशन तत्व, प्रकृति और प्रकाशन के संदर्भ में न्यायसंगत हो या सार्वजनिक लाभ के लिए हो।

फेयर कमेंट और प्रेस-स्वतंत्रता की भूमिका क्या है?

फेयर कमेंट एक मानहानि बचाव है, खास कर जब टिप्पणी सार्वजनिक हित के लिए हो और समीक्षा/कथन सामान्य रूप से उचित हो।

आर्धिक-विशेष Privilege क्या है?

Absolute या qualified privilege ऐसे प्रसंग हैं जहां प्रकाशित सामग्री को विशेष परिस्थितियों में बचाव मिलता है, जैसे संसद के अध्याय, अदालत के रिकॉर्ड आदि।

क्या ऑनलाइन पोस्ट से मानहानि का केस बन सकता है?

हाँ, सोशल मीडिया, ब्लॉग, चैट और वेब-प्रकाशनों से मनीहत हो सकती है; IPC के साथ IT अधिनियम के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं।

मानहानि के लिए क्या समय-सीमा है?

नागरिक मानहानि के लिए Limitation Act के अनुसार समय-सीमा होती है, पर धाराएं और परिस्थितियाँ अनुसार भिन्न हो सकती हैं।

कौन से तथ्य प्रमाण के लिए जरूरी होते हैं?

साक्षी, दस्तावेज, रिकॉर्ड्स और प्रकाशित सामग्री का प्रमाण मानहानि मामलों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

क्या अदालत मानहानि मामले में राहत दे सकती है?

हां, अदालत क्षतिपूर्ति, मुआवजा, माफीनामा, या प्रकाशन-रोके जाने जैसे राहत दे सकती है।

अगर मैं प्रतिवादी हूँ तो क्या करूं?

कानूनी सलाहकार से तुरंत परामर्श लें, जिरह के लिए संविदा-नोट बनाएं, उत्तर दाखिल करें और घटनाक्रम का संक्षिप्त रिकॉर्ड रखें।

क्या मैं अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध भी मुकदमा कर सकता/सकती हूँ?

हाँ, यदि अन्य व्यक्तियों ने भी मानहानि का प्रकाशन किया है और आपके पक्ष में प्रमाण उपलब्ध हैं, तब कई पक्षों के विरुद्ध दावा किया जा सकता है।

कौन सी अदालत में केस दायर किया जा सकता है?

आपके केस का क्षेत्राधिकार उसी जिले की अदालत में होगा जहां प्रकाशन हुआ या आरोपी रहता है; उच्च कदम के लिए Patna High Court में अपील की जा सकती है।

क्या सत्यापित दस्तावेज जरूरी हैं?

हां, साक्ष्य और आधिकारिक दस्तावेज मानहानि के दावे के लिए अहम होते हैं, खास कर कारण-प्रमाण और प्रकाशन के समय को साबित करना जरूरी होता है।

डिजिटल मानहानि के लिए कौन से कदम जरूरी हैं?

पोस्ट के स्क्रीनशॉट, लिंक, उपयोगकर्ता पहचान और स्रोत की सत्यता का प्रमाण आवश्यक होता है; advokat से डिजिटल प्रमाणों के संवर्धन की सलाह लें।

क्या मानहानि के मामले में क्षतिपूर्ति तय होती है?

हाँ, अदालत नुकसान-नुकसान, मानसिक पीड़ा, प्रतिष्ठा क्षति आदि के आधार पर क्षतिपूर्ति तय कर सकती है।

अतिरिक्त संसाधन

  1. Law Commission of India - defamation पर विश्लेषण और अनुशंसाएँ उपलब्ध हैं। https://lawcommissionofindia.nic.in/
  2. Press Council of India - मीडिया आचार-संहिता और मानहानि से जुड़ी दिशा-निर्देशों के लिए एक प्रमुख स्रोत। https://pci.gov.in/
  3. Centre for Internet and Society - ऑनलाइन भाषण, पूर्वाग्रह और defamation से जुड़े शोध और संसाधन। https://cis-india.org/

अगले कदम

  1. अपने मामले का संक्षिप्त सार तैयार करें; कौन सा प्रकाशन हुआ और कब हुआ, यह स्पष्ट करें।
  2. स्थान, दोषी पक्ष और क्षेत्राधिकार का निर्धारण करें; गया जिला कोर्ट या पटना उच्च न्यायालय की राह देखें।
  3. नजदीकी मानहानि विशेषज्ञ वकील से पहले परामर्श लें; उनकी अनुभवी टीम से योजना बनाएं।
  4. साक्ष्यों का संकलन करें-प्रकाशन का रिकॉर्ड, स्क्रीनशॉट, लिंक, संदिग्ध स्रोत।
  5. फीस संरचना, घड़ी-घटिकाओं और संभावना के बारे में स्पष्ट लिखित मामले-नीति बनाएं।
  6. उत्तर/जवाब नोट बनाकर अदालत में प्रस्तुत करने के लिए रणनीति तय करें।
  7. घरेलू और ऑनलाइन दोनों दायरे में अपने अधिकारों के अनुसार कदम उठाएं और समय-सीमा पर ध्यान दें।

नोट: यह गाइड सूचना-आधारित है और कानूनी सलाह नहीं है। गया, बिहार के लिए स्थानीय अदालतों और प्रक्रियाओं के अनुरूप विशिष्ट सलाह के लिए एक प्रमाणित वकील से परामर्श करें।

उद्धरण स्रोत (आधिकारिक):

All citizens shall have the right to freedom of speech and expression. Article 19(1)(a) Constitution of India.

Source: Constitution of India

Section 66A of the Information Technology Act, 2000 is unconstitutional.

Source: Shreya Singhal v Union of India, (2015) 5 SCC 1

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