दिल्ली में सर्वश्रेष्ठ पुनर्गठन और दिवालियापन वकील
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दिल्ली, भारत में सर्वश्रेष्ठ वकीलों की सूची
1. Delhi, India में Restructuring & Insolvency कानून के बारे में
दिल्ली में Restructuring और Insolvency कानून मुख्य रूप से Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) के अधीन संचालित होते हैं. यह कानून कॉर्पोरेट, साझेदारी फर्म और व्यक्तियों के लिए दिवालियापन और पुनर्गठन के लिए समय-सीमा पर केंद्रित है. IBC परिसंपत्तियों के मूल्य संरक्षण और क्रेडिटर के हित के अनुसार त्वरित समाधान सुनिश्चित करने का उद्देश्य रखता है.
दिल्ली में CIRP, पुनर्गठन और आंतरिक अपीलीय प्रक्रियाएं National Company Law Tribunal, Delhi Bench और National Company Law Appellate Tribunal के अधीन चलती हैं. इन संस्थाओं के निर्णय वफादार क्रेडिटर गठबंधन (CoC) के साथ मिलकर आगे की रणनीति तय करते हैं. CIRP सामान्यतः 180 दिनों के भीतर पूरा कराने की कोशिश है, और कुछ परिस्थितियों में विस्तार संभव है.
“The Insolvency and Bankruptcy Code provides for time bound resolution of insolvency and bankruptcy.”
Source: Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - https://www.ibbi.gov.in/
2021 के IBC संशोधन ने Pre-Packaged Insolvency Resolution Process (P-PIRP) जैसे विकल्प जोड़े, ताकि going concern बनाए रखा जा सके. इसके साथ ही तेज़ी से CIRP और अन्य प्रक्रियाओं के नियमों में स्पष्टता आई. Delhi में इन संशोधनों से कॉरपोरेट डेब्टर्स के लिए पुनर्गठन के नए विकल्प खुले हैं.
“The objective is to provide a more flexible and faster restructuring mechanism for corporate debtors.”
Source: IBBI - https://www.ibbi.gov.in/
दिल्ली निवासियों के लिए व्यावहारिक टिप्स - दिल्ली में स्थानीय अदालतें और आयुक्त फोरम अक्सर मामलों की गति पर प्रभाव डालते हैं. प्रारम्भिक दस्तावेज़ एकत्र करें, समय-सीमा समझें और अनुभवी advoser से शुरुआती परामर्श लें. समय-सारिणी, दस्तावेज़-संरचना और संचार की स्पष्टता सफल समाधान के मुख्य तत्व हैं.
2. आपको वकील की आवश्यकता क्यों हो सकती है
Restructuring और Insolvency मामलों में सही वकील चुना जाना निर्णायक होता है. नीचे दिल्ली से संबन्धित 6 विशिष्ट परिस्थितियाँ दी जा रही हैं.
- Scenario 1 - दिल्ली-आधारित कॉरपोरेट डेब्टर पर बैंक द्वारा CIRP दायर किया गया है. आपको Insolvency Professional (IP) चयन, पिटीशन ड्राफ्टिंग, CoC से संवाद, और कोर्ट-प्रेसिडिंग में काबू की जरूरत होती है.
- Scenario 2 - दिल्ली-आधारित ऑपरेशनल क्रेडिटर CIRP के दावे के लिए पिटीशन फाइल करता है. मुकदमे की तैयारी, वैधानिक नोटिस, मोराटोरियम इफेक्ट और दावों के मूल्यांकन में विशेषज्ञता चाहिए.
- Scenario 3 - Pre-Packaged Insolvency Resolution Process Delhi-आधारित कॉरपोरेट ड Debtor के लिए लागू हो सकता है. पहले से निहित समस्या-समझौते, resolution plan और स्टेकहोल्डर संबद्धताओं की तैयारी जरूरी है.
- Scenario 4 - Companies Act 2013 के तहत compromise or arrangement (Section 230-232) दिल्ली-आधारित कंपनी के लिए. यह IBC के विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकता है और कोर्ट-आदेश चाहिए होता है.
- Scenario 5 - Cross-border insolvency मामले दिल्ली-स्थित कॉरपोरेट ग्रुप के लिए. विदेशीு kreditor, cross-border नियम, कानूनों के समन्वय की जरूरत पड़ती है.
- Scenario 6 - व्यक्तिगत insolvency Delhi-निवासी की स्थिति. Part III IBC के अंतर्गत राहत, ऋण निपटान और court-समन्वय के लिए कानूनी मार्गदर्शन चाहिए.
यहाँ प्रत्येक स्थिति के साथ एक मजबूत कानूनी रणनीति बनानी होगी. आपके वकील को यही बताएगा कि कौन सा रास्ता सबसे फायदेमंद है. Delhi-आधारित केसों में स्थानीय bench के नियमों और पूर्ववत NCLT-निर्णय का ध्यान रखना अनिवार्य है.
3. स्थानीय कानून अवलोकन
Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) दिल्ली में CIRP, मोराटोरियम, रिज़ॉल्यूशन प्लान और डिक्री-निर्णयों के लिए मुख्य कानून है. यह कॉर्पोरेट डेब्टर्स, पार्टनरशिप फर्म और व्यक्तियों दोनों के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं निर्धारित करता है.
National Company Law Tribunal, Delhi Bench और National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) दिल्ली-केंद्रित insolvency मामलों की न्यायिक धुरी हैं. NCLT केस-फाइलिंग, मॉराटोरियम और रिज़ॉल्यूशन प्लान की निगरानी करता है; NCLAT appellate मंच है.
Companies Act, 2013 के सेक्शन 230-232 का प्रयोग दिल्ली के भीतर compromise or arrangement के लिए किया जा सकता है. यह IBC के विकल्प के रूप में भी विकल्प देता है और डील-निर्णय के लिए shareholders approvals आवश्यक होते हैं.
“The Companies Act provides mechanisms for compromise, arrangement and reconstruction of companies.”
Source: Ministry of Corporate Affairs (MCA) - https://www.mca.gov.in/
4. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
IBC क्या है?
IBC एक समय-सीमा में दिवालियापन और पुनर्गठन के लिए केंद्रीय कानून है. यह कॉर्पोरेट, साझेदारी और व्यक्तियों के हितों की सुरक्षा करता है. यह कानून एक संरचित प्रक्रिया के साथ ऋण-देयता को व्यवस्थित करता है.
Delhi में CIRP कब शुरू हो सकता है?
किसी क्रेडिटर के द्वारा अदालत के समक्ष CIRP दाखिल किया जा सकता है. मानक प्रक्रिया में NCLT दिल्ली कोर्ट में पिटीशन दायर करना, मोराटोरियम लागू करना और Insolvency Professional नियंत्रित प्रक्रिया शुरू करना शामिल है.
FAQs के अनुसार CIRP में कितनी समय-सीमा होती है?
बेसलाइन समय-सीमा सामान्यतः 180 दिन है. जरूरत पड़ने पर NCLT 90 दिन तक extension दे सकता है.
मोराटोरियम क्या है और इसका प्रभाव kya hai?
मोराटोरियम सेपट 14 IBC के अंतर्गत ऋणदाताओं के विरुद्ध बाह्य प्रवर्तन रोक दिया जाता है. इस समय में कंपनी के क्रेडिटर्स और सीआईआरपी-समिति निर्णय लेती है.
IP (Insolvency Professional) की भूमिका क्या है?
IP CIRP-प्रक्रिया का ऑपरेटर होता है. वह पिटिशन, परिसंपत्ति मूल्यांकन, CoC-समिति के साथ बातचीत और रिज़ॉल्यूशन प्लान की निगरानी करता है.
Resolution Plan क्या होता है?
यह प्रस्तावित बिजनेस-रणनीति है जो कंपनी को पुनर्जीवित करती है. CoC द्वारा अनुमोदन के बाद प्लान NCLT द्वारा मंजूरी के लिए भेजा जाता है.
Pre-Packaged Insolvency Process (P-PIRP) क्या है?
P-PIRP एक पूर्व-समझौता-आधारित प्रक्रिया है जिसमें पूर्व-निर्धारित पक्षकारों के साथ विवाद हल होते हैं. यह going concern बनाए रखने में मदद करता है. दिल्ली में कॉरपोरेट डेब्टर्स के लिए इसे एक वैकल्पिक मार्ग माना गया है.
Small Corporate Debtor के लिए Fast Track CIRP क्या है?
यह छोटे डेब्टरों के लिए एक streamlined CIRP है. प्रक्रिया तेज़ होती है और निर्णय-निर्माण सरल होता है.
क्या व्यक्तिगत असफलताओं के लिए दिल्ली में IBC के अंतर्गत कुछ है?
हाँ, IBC के भाग III के अंतर्गत Individuals and Partnership Firms insolvency के लिए प्रावधान है. यह NCLT के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है.
Cross-border Insolvency Delhi में कैसे नियंत्रित होता है?
IBC में cross-border insolvency प्रावधान हैं. विदेशी परिसंपत्तियों के मामलों में IBBI और NCLT के साथ मिलकर समन्वय किया जाता है.
कया CIRP के विरुद्ध अपील संभव है?
हाँ, CIRP और अन्य निर्णयों के विरुद्ध NCLT/ NCLAT तक appeal किया जा सकता है. NCLAT appellate अधिकार देता है.
कानूनी सलाह लेते समय किन बिंदुओं पर ध्यान दें?
विद्यमान रिकॉर्ड, पिटिशन-डाक्यूमेंट, IP चयन और CoC संरचना की समझ आवश्यक है. Delhi में स्थानीय कोर्ट-प्रथाओं के अनुरूप अनुभवी advoser चुनें.
IBC में कुल खर्च कितना आ सकता है?
यह केस-गतिशीलता, केस-एसेट वैल्यू और IP-फीस के अनुसार बदलता है. शुरुआती consultation के समय खर्च का अनुमान जरूर लें.
Delhi में परिवारिक or व्यक्तिगत insolvency के लिए किन दस्तावेज़ों की जरूरत होगी?
पहचान पत्र, ऋण-बुक्स, बकाया ऋणों के प्रमाण, आय-खर्च का विवरण और संपत्ति-से संबंधी दस्तावेज अहम होते हैं.
कौन सा कानून Delhi में पहले लागू होता है?
IBC प्रमुख कानून है. इसके अलावा Companies Act 2013 और NCLT/NCLAT के नियम भी प्रभावी हैं.
कौन सा संस्थान Delhi के insolvent मामलों की निगरानी करता है?
NCLT Delhi Bench, NCLAT और IBBI के दिशानिर्देश इन मामलों को लागू करते हैं.
5. अतिरिक्त संसाधन
- Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - IBC, IP पंजीकरण, गाइडलाइंस और नोटिस.
- National Company Law Tribunal (NCLT) - Delhi Bench - CIRP फॉर्म, मीडिया निर्णय और डेस्क.
- National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) - अपील और appellate आदेश.
6. अगले कदम
- अपने केस की स्थिति का आकलन करें और जरूरी दस्तावेज़ बनाएं. कॉर्पोरेट रिकॉर्ड्स, ऋण-डॉक्यूमेंट तथ्य का सार हैं.
- दिल्ली में अनुभवी Restructuring & Insolvency वकील या कानूनी सलाहकार चुनें. IP पंजीकृत फर्मों से initial consultation लें.
- पहले क्लियर-चेकलिस्ट के आधार पर रणनीति बनाएं-CIRP, PIRP या Companies Act-आधारित उपाय।
- लॉयर के साथ आवश्यक पिटीशन्स, नोटिस, और दाखिल-सम्बन्धी प्रपत्रों की तैयारी शुरू करें.
- Insolvency Professional (IP) नियुक्त करें और CoC के साथ संपर्क बनाएं. प्लान-ड्राफ्टिंग शुरू करें.
- गठन-बद्ध समय-सीमा के भीतर अदालत-निर्णय के अनुरूप कार्य करें और आवश्यक संशोधन करें.
- दस्तावेज़-प्रमाण और संचार का रिकॉर्ड बनाए रखें. सभी चरणों में Delhi-विशिष्ट कोर्ट-प्रारूपों का पालन करें.
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