लखनऊ में सर्वश्रेष्ठ पुनर्गठन और दिवालियापन वकील
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लखनऊ, भारत में सर्वश्रेष्ठ वकीलों की सूची
1. लखनऊ, भारत में पुनर्गठन और दिवालियापन कानून का संक्षिप्त अवलोकन
लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश में पुनर्गठन और दिवालियापन कानूनों का प्रमुख ढांचा Insolvency and Bankruptcy Code 2016 (IBC) है. यह कानून कंपनियों, व्यक्तियों और साझेदारी फर्मों के लिए समय-सीमा के साथ समाधान देता है. इससे creditors-owners के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है.
Insolvency and Bankruptcy Code 2016 aims to consolidate and amend the laws relating to reorganisation and insolvency resolution of corporate persons, partnership firms and individuals in a time bound manner.Source: Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - ibbi.gov.in
Lucknow में मामले आम तौर पर NCLT के उत्तर प्रदेश क्षेत्राधिकार में जाते हैं. UP के अधिकांश CIRP मामलों की सुनवाई NCLT Allahabad bench द्वारा होती है. यह क्षेत्रीय न्याय और प्रक्रियात्मक दिशा तय करता है. अनुभवी अधिवक्ता स्थानीय अदालतों के साथ मिलकर काम करते हैं.
स्थानीय वकीलों की सलाह से आप सही फॉर्मेट, तिथि और दायरियों की तैयारी कर सकते हैं. IBC के अंतर्गत प्रक्रिया समय-सीमा के भीतर पूरी करने का लक्ष्य है. यह प्रक्रिया ऋणदाता और देनदार के बीच पुनर्गठन की योजना को प्राथमिकता देती है.
IBC provides for a time bound resolution framework to maximise value for creditors and to balance the interests of all stakeholders.Source: Ministry of Corporate Affairs (MCA) - mca.gov.in
2. आपको वकील की आवश्यकता क्यों हो सकती है
नीचे Lucknow-आधारित हालात के विरुद्ध 4-6 विशिष्ट परिदृश्य दिए गए हैं. इन स्थितियों में कानूनी सहायता लाभकारी रहती है.
- लखनऊ-आधारित एक कंपनी ने ऋणदाताओं के साथ CIRP शुरू करने की योजना बनाई है. यह एक जटिल प्रक्रिया है और सही दस्तावेज चाहिए होते हैं.
- बैंक या वित्तीय संस्थान ने एक व्यवसाय के विरुद्ध insolvency proceedings दायर करने की तैयारी की है. आपको सक्षम अधिवक्ता की आवश्यकता होगी ताकि मामला सही तरीके से प्रस्तुत हो.
- कंपनी पुनर्गठन के लिए “Resolution Plan” बनाते समय व्यक्तिगत नियोक्ता-हितों का संतुलन बना रहे. एक अनुभवी वकील मार्गदर्शन दे सकता है.
- Operational creditors की ओर से दावा किये गए बकायें विवादित हों. ऐसे केस में सही शिकायत और समाधान योजना जरूरी है.
- व्यक्ति के रूप में व्यक्तिगत दिवालियापन मामलों में पेशेवर सलाह आवश्यक होती है ताकि प्रॉसीजर सही चले और संपत्ति बच सके.
3. स्थानीय कानून अवलोकन
Lucknow क्षेत्र के लिए प्रासंगिक मुख्य कानून नीचे दिए गए हैं. इनकी धाराएं पुनर्गठन और दिवालियापन प्रक्रियाओं को निर्देशित करती हैं.
- Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) - कॉर्पोरेट पर्सन, पार्टनरशिप फर्म और व्यक्तियों के लिए ÏBC प्रक्रिया का मूल ढांचा देता है.
- Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002 (SARFAESI Act) - secured ऋण के अधीन_asset recovery के लिए लागू होता है.
- Companies Act, 2013 - कंपनियों के लिए पुनर्गठन, समझौते और संरचनात्मक परिवर्तन की प्रक्रियाओं का आधार है. Sections 230-234 प्रायः खासकर प्रस्तावित समझौता और विलय के संदर्भ में उद्धृत होते हैं.
ध्यान दें: PPIRP जैसे नवीन उपाय 2021 के बाद लागू हुए हैं ताकि MSMEs आदि के लिए संक्षिप्त पुनर्गठन संभव हो सके. इन प्रावधानों के लिए IBBI और MCA की रेगुलेशनों की जाँच करें.
4. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
IBC क्या है?
IBC एक केंद्रीय कानून है जो पुनर्गठन और दिवालियापन प्रक्रिया को समय-बद्ध तरीके से संचालित करता है. यह देनदार के مالية संकट के समाधान के लिए रोडमैप देता है.
CIRP क्या है?
CIRP एक समय-सीमा-आधारित प्रक्रिया है जिसमें एक Resolution Professional ऋणदाता समूह के साथ मिलकर पुनर्गठन योजना बनाता है. अगर योजना असफल हो तो परिसमापन हो सकता है.
लखनऊ में केस कहां दायर होता है?
अधिकतर UP के CIRP मामले NCLT Allahabad bench में सुने जाते हैं. स्थानीय न्याय प्रक्रिया और फाइलिंग के लिए आपके वकील की मार्गदर्शिका जरूरी है.
CoC क्या भूमिका निभाता है?
Committee of Creditors CoC ऋणदाताओं का समूह है जो पुनर्गठन योजना को मंजूरी देता है. वे निर्णय लेने वाला मुख्य प्राधिकरण होते हैं.
Resolution Professional कौन होता है?
RP CIRP के दौरान नियुक्त किया जाने वाला पेशेवर है. RP ही योजना-निर्माण और क्रियान्वयन का केंद्र बिंदु होता है.
IBC की समय-सीमा क्या है?
आम तौर पर CIRP की मूल अवधि 180 दिन है. कुछ परिस्थितियों में अदालत समय-सीमा बढ़ाने की अनुमति दे सकती है.
क्या व्यक्तिगत दिवालियापन भी आता है?
हाँ, IBC के अंतर्गत व्यक्तिगत insol vency के लिए प्रक्रियाएं मौजूद हैं. Lucknow में भी व्यक्तिगत दावे इन प्रावधानों के अनुसार निपटते हैं.
डॉक्यूमेंट्स कैसी तैयारी चाहिए?
आमतौर पर वित्तीय विवरण, लोन एप्लिकेशन, सप्लायर्स-क्रेडिटर्स के दावे, एसेट-लायबिलिटी का पूर्ण ब्योरा और संस्थागत रिकॉर्ड चाहिए होते हैं.
क्या मैं खुद कानूनी मदद ले सकता हूँ?
गंभीर मामलों में एक योग्य advộticate की सेवा लेना उचित है. वे सही फॉर्मेट, दायरियाँ और समय-सीमा सुनिश्चित कर देंगे.
कौन से डोकेमेंटेशन के साथ शुरुआत करनी चाहिए?
प्रारम्भिक दस्तावेजों में बैंक स्टेटमेंट, आय-व्यय विवरण, ऋण-समझौतों के प्रमाण, कंपनी पंजीकरण दस्तावेज और कॉन्टैक्ट-डिटेल्स शामिल हों.
क्या विदेशी पक्ष भी IBC के अंतर्गत आते हैं?
कुछ मामलों में cross-border insolvency rules लागू होते हैं. यह परिदृश्य अधिक जटिल होते हैं और विशेषज्ञ मार्गदर्शन मांगते हैं.
कानूनी शुल्क कितने होते हैं?
फीस आकार और केस की जटिलता पर निर्भर करती है. शुरुआती परामर्श सामान्यतः कम होता है और आगे की प्रक्रिया में बढ़ सकता है.
अगर फैसला गलत हो तो क्या कर सकते हैं?
अपील और संशोधन के उपाय उपलब्ध हैं. अदालत-स्तर पर वैकल्पिक रास्ते भी हो सकते हैं जिन्हें वकील समझायेंगे.
5. अतिरिक्त संसाधन
नीचे Lucknow क्षेत्र के लिए प्रमुख संगठनों के संसाधन दिए गए हैं.
- Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) - आधिकारिक वेबसाइट: ibbi.gov.in
- National Company Law Tribunal (NCLT) - UP क्षेत्र के मामलों के लिए प्रैक्टिस: nclt.gov.in
- Ministry of Corporate Affairs (MCA) - IBC और गैर-IBC रेगुलेशनों की जानकारी: mca.gov.in
6. अगले कदम
- अपना केस प्रकार स्पष्ट करें: CIRP, PPIRP, या व्यक्तिगत दिवालियापन किसके लिए?
- Lucknow में अनुभव रखने वाले उपयुक्त वकील खोजें और उनकी फीडबैक देखें.
- पहला परामर्श तय करें ताकि केस-स्कोप, टाइमलाइन और लागत स्पष्ट हों.
- आवश्यक दस्तावेज एकत्रित करें: वित्तीय रिकॉर्ड, ऋण-समय, सप्लायर दावा आदि.
- Engagement Letter पर सहमति बनाएं और पूर्व-आंकड़े समझें.
- नुकसान और जोखिम का आकलन करें; रणनीति के पक्ष ले जाएँ.
- नियमित अद्यतन के लिए RP के साथ संपर्क बनाए रखें और CoC निर्णय की प्रतीक्षा करें.
महत्वपूर्ण उद्धरण
IBC provides a clear framework for resolution of insolvency in a time-bound manner. It balances creditor rights with debtor rehabilitation.Source: IBBI - ibbi.gov.in
IBC aims to consolidate and amend laws relating to reorganisation and insolvency resolution of corporate persons, partnership firms and individuals in a time-bound manner.Source: IBBI - ibbi.gov.in
IBC and related regulations are designed to promote entrepreneurship, availability of credit and balance the interests of all stakeholders.Source: MCA - mca.gov.in
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